Dhruva Sarja की फिल्म KD का ट्रेलर देखा… और सच बोलूं तो दिमाग खराब हो गया। ये फिल्म अभी भी कैसे चल रही है या चलने वाली है, ये समझ से बाहर है। मतलब seriously, ये लोग टिक कैसे जाते हैं इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में बनाकर? एक अच्छी फिल्म देखने के लिए हमें कितनी बार ये टॉर्चर झेलना पड़ेगा?
ट्रेलर चालू होते ही तेज म्यूजिक, स्लो मोशन और बिना मतलब का एक्शन… लेकिन कहानी? जीरो। कुछ समझ ही नहीं आता कि चल क्या रहा है। ऐसा लगता है बस जो भी कूल दिखे, सब ठूंस दो—चाहे उसका कोई मतलब हो या नहीं। ध्रुव सर्जा को देखकर तो यही लगा कि भाई, पहले किसी को इनको एक्टिंग सिखानी चाहिए। एक्सप्रेशन ऐसे हैं जैसे हर सीन में वही एक ही मूड चल रहा हो—ना इमोशन, ना कनेक्शन। बस कैमरे के सामने खड़े होकर अजीब-अजीब चेहरे बनाना ही अगर एक्टिंग है, तो फिर क्या ही कहें।
ऑडियंस को समझ क्या रखा है?
आजकल लोग हर तरह का कंटेंट देख रहे हैं—OTT पर बढ़िया शो, इंटरनेशनल फिल्में—और इधर हमें ये सब परोसा जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे मेकर्स को फर्क ही नहीं पड़ता कि ऑडियंस क्या चाहती है। बस फॉर्मूला उठाओ और बना दो फिल्म। लोग बोलते हैं कि ट्रेलर देखकर फिल्म को जज मत करो। लेकिन भाई, ट्रेलर ही तो पहली झलक है। अगर वही इतना खराब है कि गुस्सा आ जाए, तो पूरी फिल्म में क्या उम्मीद रखी जाए? अगर कंटेंट में दम होता, तो ट्रेलर खुद ही बोलता।
विजुअल्स: ज्यादा ओवरएक्टिंग, कम इम्पैक्ट

फिल्म में हर चीज़ को इतना ओवर कर दिया गया है—कलर, एक्शन, कैमरा मूवमेंट—कि कुछ भी नैचुरल नहीं लगता। सब कुछ ऐसा लग रहा है जैसे सिर्फ दिखाने के लिए बनाया गया हो, असल में कोई सॉलिड चीज़ है ही नहीं।

सीधा सा बोलें तो KD का ट्रेलर देखकर एक्साइटमेंट नहीं, सिर्फ चिढ़ पैदा होती है। अब हो सकता है फिल्म ट्रेलर से बेहतर निकले—but honestly, chances बहुत कम लग रहे हैं। अगर ट्रेलर ही इतना बकवास है, तो पूरी फिल्म देखने की हिम्मत जुटाना ही सबसे बड़ा काम होगा।